दबी-दबी सी,
है हँसी मेरी,
कुछ उलझी-उलझी सी,
है तक़दीर मेरी ।
कौन है भरोसेमंद यहाँ?
छल से भरा है ज़माना,
कौन है मित्र किसका?
कौन अपना, कौन पराया ।
सब दुनियावाले,
नक़ाब पहनकर है घूमते,
चेहरे पर बनते हैं अच्छे,
घूमते ही बन जाते हैं बुरे ।
दो तस्वीरें रखते हैं लोग,
बदलते रहते है ढूँढते ही संजोग,
नादान परिंदे, रहे हैं भोग,
ऐसे लोगों का फैलाया रोग ।
दबी-दबी सी,
है हँसी मेरी,
कुछ उलझी-उलझी सी,
है तक़दीर मेरी ।
छल से तुम बने,
अच्छे से बुरे,
कभी पूछा है खुद से,
अपनों से कितने हुए हो परे?
बुरी आदतें,
शीघ्र है सीखते,
संस्कार अपने,
है भूल जाते ।
प्रख्यात बनने की चाह में,
छोड़ जाते हैं हम अपनों को राह में,
इस दुनिया के छल की आग में,
हम हैं तबाह होते ।
दबी-दबी सी,
है हँसी मेरी,
कुछ उलझी-उलझी सी,
है तक़दीर मेरी ।
है हँसी मेरी,
कुछ उलझी-उलझी सी,
है तक़दीर मेरी ।
कौन है भरोसेमंद यहाँ?
छल से भरा है ज़माना,
कौन है मित्र किसका?
कौन अपना, कौन पराया ।
सब दुनियावाले,
नक़ाब पहनकर है घूमते,
चेहरे पर बनते हैं अच्छे,
घूमते ही बन जाते हैं बुरे ।
दो तस्वीरें रखते हैं लोग,
बदलते रहते है ढूँढते ही संजोग,
नादान परिंदे, रहे हैं भोग,
ऐसे लोगों का फैलाया रोग ।
दबी-दबी सी,
है हँसी मेरी,
कुछ उलझी-उलझी सी,
है तक़दीर मेरी ।
छल से तुम बने,
अच्छे से बुरे,
कभी पूछा है खुद से,
अपनों से कितने हुए हो परे?
बुरी आदतें,
शीघ्र है सीखते,
संस्कार अपने,
है भूल जाते ।
प्रख्यात बनने की चाह में,
छोड़ जाते हैं हम अपनों को राह में,
इस दुनिया के छल की आग में,
हम हैं तबाह होते ।
दबी-दबी सी,
है हँसी मेरी,
कुछ उलझी-उलझी सी,
है तक़दीर मेरी ।